चन्द्रवंश से कुरुवंश तक की उत्पत्ति
पुराणों के
अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरू हुए। पुरू के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए। कुरु के वंश में शान्तनु का जन्म हुआ। शान्तनु से गंगानन्दन भीष्म उत्पन्न हुए। उनके दो छोटे भाई और थे - चित्रांगद और विचित्रवीर्य । ये शान्तनु से सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। शान्तनु के स्वर्गलोक चले जाने पर भीष्म ने अविवाहित रह कर अपने
भाई विचित्रवीर्य के राज्य का पालन किया। चित्रांगद बाल्यावस्था में ही चित्रांगद
नाम वाले गन्धर्व के द्वारा मारे गये। फिर भीष्म संग्राम में विपक्षी को परास्त करके काशिराज की दो कन्याओं - अंबिका और अंबालिका को हर लाये। वे दोनों विचित्रवीर्य की
भार्याएँ हुईं। कुछ काल के बाद राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो
स्वर्गवासी हो गये। तब सत्यवती की अनुमति से व्यासजी के द्वारा अम्बिका के गर्भ से
राजा धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने
गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था और पाण्डु के युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव आदि पांच पुत्र हुए।
पाण्डु का राज्य अभिषेक
धृतराष्ट्र जन्म से ही अन्धे थे अतः उनकी जगह
पर पाण्डु को राजा बनाया गया, इससे
धृतराष्ट्र को सदा अपनी नेत्रहीनता पर क्रोध आता और पाण्डु से द्वेषभावना होने
लगती। पाण्डु ने सम्पूर्ण भारतवर्ष को जीतकर कुरु राज्य की सीमाओ का यवनो के देश
तक विस्तार कर दिया। एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री
- के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत
हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृगरुपधारी
निर्दोष ऋषि ने पाण्डु को शाप दिया, "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे
मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो
जायेगी।"
इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से
बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का
त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को
सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने
साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन
में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी। इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन
ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन
ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों
ने कहा, "राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम
आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।"ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु
अपनी पत्नी से बोले, "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति
पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता
क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?" कुन्ती बोली, "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया
है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ।
आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।" इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित
करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा
गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को
आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति
हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी।
माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ। एक दिन
राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण
अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से
माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत
हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों
के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई। वहा रहने वाले ऋषि मुनि पाण्ड्वो
को राजमहल छोड़् कर आ गये, ऋषि मुनि
तथा कुन्ती के कहने पर सभी ने पाण्ड्वो को पाण्डु का पुत्र मान लिया और उनका
स्वागत किया।
जब कुन्ती का विवाह नहीं हुआ था, उसी समय (सूर्य
के अंश से) उनके गर्भ से कर्ण का जन्म हुआ था। परन्तु लोक लाज के भय से कुन्ती ने कर्ण को एक बक्से मे
बन्द करके गंगा नदी मे बहा कर्ण गंगाजी में बहता हुआ जा रहा था कि महाराज
धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ और उनकी पत्न राधा ने उसे देखा और उसे गोद ले लिया और
उसका लालन पालन करने लगे। कुमार अवास्था से ही कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के
समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य
द्रोण से मिले जो कि उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे।
द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को
शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था और द्रोण केवल
क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे। द्रोणाचार्य की असम्मति के उपरान्त कर्ण ने
परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण
ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का
आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात
किया। इस प्रकार कर्ण परशुराम का एक अत्यंत परिश्रमी और निपुण शिष्य बना। कर्ण दुर्योधन के आश्रय में रहता था। दैवयोग तथा शकुनि के छल कपट से
कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बड़ी खोटी बुद्धि का
मनुष्य था। उसने शकुनि के कहने पर पाण्ड्वो को बचपन मे कई बार मारने का प्रयत्न
किया। युवावस्था मे आकर जब गुणो मे उससे अधिक श्रेष्ठ युधिष्ठर को युवराज बना दिया
गया तो शकुनि ने लाक्ष के बने हुए धर में पाण्डवों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने
का प्रयत्न किया किन्तु विदुर की सहायता से पाँचों पाण्डव अपनी माता के साथ उस
जलते हुए घर से बाहर निकल गये। वहाँ से एकचक्रा नगरी में जाकर वे मुनि के वेष में
एक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे। फिर बक
नामक राक्षस का वध करके व्यास जी के कहने पर वे पांचाल-राज्य में, जहाँ द्रौपदी का स्वयंवर होनेवाला था, गए। पांचाल-राज्य में अर्जुन के लक्ष्य-भेदन के कौशल से मत्स्यभेद होने पर पाँचों पाण्डवों ने
द्रौपदी को पत्नीरूप में प्राप्त किया।
इन्द्रप्रस्थ की स्थापना
पाण्ड्व श्रीकृष्ण के साथ खाण्डववन में मय दानव तथा
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित इन्द्रप्रस्थ नगर को देखते हुए
द्रौपदी स्वयंवर के पहले विदुर को छोड़ कर सभी पाण्ड्वो को
मृत समझने लगे और इस कारण धृतराष्ट्र ने इस कारण शकुनि के कहने पर दुर्योधन को
युवराज बना दिया। द्रौपदी स्वयंवर के तत्पश्चात दुर्योधन आदि को पाण्ड्वो के जीवित
होने का पता चला। पाण्ड्वो ने कौरवों से अपना राज्य मांगा परन्तु गृहयुद्ध के संकट
से बचने के लिए युधिष्ठर ने कौरवों द्वारा दिए खण्डहर स्वरुप खाण्डववन आधे राज्य
के रुप मे प्राप्त किया। पाण्डुकुमार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डववन
खाण्डववन को जला दिया और इन्द्र के द्वारा की हुई वृष्टि का अपने बाणों के (छत्राकार) बाँध से निवारण
करते हुए अग्नि को तृप्त किया।। वहा अर्जुन और कृष्ण जी ने समस्त देवताओ को युद्ध
मे परास्त कर दिया। इसके फलस्वरुप अर्जुन ने अग्निदेव से दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया और कृष्ण जी ने सुदर्शन चक्र
प्राप्त किया था। उन्हें युद्ध में भगवान कृष्ण-जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने
आचार्य द्रोण से ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होने वाले बाण प्राप्त
किये थे। इन्द्र अप्ने पुत्र अर्जुन की वीरता देखकर अतिप्रसन्न हुए। इन्द्र के
कहने पर देव शिल्पि विश्वकर्मा और मय दानव ने मिलकर खाण्डववन को इन्द्रपुरी जितने
भव्य नगर मे निर्मित कर दिया, जिसे
इन्द्रप्रस्थ नाम दिया गया
पाण्डवों की विश्व विजय और उनका वनवास
सभी पाण्डव सब प्रकार की विद्याओं में प्रवीण
थे। पाण्डवों ने सम्पूर्ण दिशाओं पर विजय पाई और युधिष्ठिर राज्य करने लगे।
उन्होंने प्रचुर सुवर्णराशि से परिपूर्ण राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया। उनका यह वैभव दुर्योधन के लिये असह्य हो उठा। उसने अपने भाई दुःशासन और वैभव प्राप्त सुहृद् कर्ण के कहने से शकुनि साथ ले, द्यूत-सभा में जूए में प्रवृत्त होकर, युधिष्ठिर को उसके भाइयो, द्रौपदी और
उनके राज्य को कपट-द्यूत के द्वारा हँसते-हँसते जीत लिया। दुर्योधन ने कुरु राज्य
सभा मे द्रौपदी का बहुत अपमान किया, उसे
निर्वस्त्र करने क प्रयास किया। श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बाचाई तत्पश्चात द्रौपदी
सभी लोगो को श्राप देने ही वाली थि परन्तु गांधारी ने आकर ऐसा होने से रोक दिया।
साथ ही मे जूए में परास्त होकर युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ वन में चले गये। वहाँ
उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये। वे वन में भी पहले ही
की भाँति प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। (एक दिन उन्होंने)
अठासी हजार द्विजोंसहित दुर्वासा को (श्रीकृष्ण-कृपा से) परितृप्त किया। वहाँ उनके साथ उनकी पत्नी
द्रौपदी और पुरोहित धौम्यजी भी थे।
बारहवाँ वर्ष बीतने पर वे विराट नगर में गये। वहाँ युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर 'कंक' नामक
ब्राह्मण के रूप में रहने लगे। भीमसेन रसोइया बने थे। अर्जुन ने अपना नाम 'बृहन्नला' रखा था। पाण्डव पत्नी द्रौपदी रनिवास में सैरन्ध्री के रूप
में रहने लगी। इसी प्रकार सहदेव-नकुल ने भी अपने नाम बदल लिये थे। भीमसेन ने रात्रिकाल में द्रौपदी का
सतीत्व-हरण करने की इच्छा रखने वाले कीचक को मार डाला। तत्पश्चात कौरव विराट की गौओं को हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जुन ने परास्त किया। उस समय
कौरवों ने पाण्डवों को पहचान लिया। श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा अर्जुन से अभिमन्यु नामक पुत्र को उत्पन्न किया था उसे राजा विराट ने अपनी
कन्या उत्तरा ब्याह दी।
शांति दूत श्रीकृष्ण, युद्ध
की शुरुवात तथा श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश
धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के
स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए। पहले भगवान श्रीकृष्ण परम
क्रोधी दुर्योधन के पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह अक्षौणही सेना के स्वामी राजा दुर्योधन से कहा-
'राजन्! तुम युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दो या
उन्हें पाँच ही गाँव अर्पित कर दो; नहीं तो
उनके साथ युद्ध करो।'
श्रीकृष्ण की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा- 'मैं उन्हें सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं
दूँगा; हाँ, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा।'
ऐसा कहकर वह भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने के लिये उद्यत
हो गया। उस समय राजसभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरूप का
दर्शन कराकर दुर्योधन को भयभीत कर दिया। फिर विदुर ने अपने घर ले जाकर भगवान का पूजन और सत्कार किया।
तदनन्तर वे युधिष्ठिर के पास लौट गये और बोले-'महाराज! आप दुर्योधन के साथ युद्ध कीजिये'
युधिष्ठिर और दुर्योधन की सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में जा डटीं। अपने विपक्ष में पितामह भीष्म तथा
आचार्य द्रोण आदि गुरुजनों को देखकर अर्जुन युद्ध से विरत हो गये, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा-"पार्थ!
भीष्म आदि गुरुजन शोक के योग्य नहीं हैं। मनुष्य का शरीर विनाशशील है, किंतु आत्मा का कभी नाश नहीं होता। यह आत्मा
ही परब्रह्म है।
'मैं ब्रह्म हूँ'- इस प्रकार तुम उस आत्मा को समझो। कार्य की
सिद्धि और असिद्धि में समानभाव से रहकर कर्मयोग का आश्रय ले क्षात्रधर्म का पालन
करो।"
श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन रथारूढ़ हो युद्ध में
प्रवृत्त हुए। उन्होंने शंखध्वनि की। दुर्योधन की सेना में सबसे पहले पितामह भीष्म
सेनापति हुए। पाण्डवों के सेनापति शिखण्डी थे। इन दोनों में भारी युद्ध छिड़ गया। भीष्मसहित कौरव पक्ष के योद्धा उस युद्ध में पाण्डव-पक्ष के सैनिकों पर प्रहार करने लगे और
शिखण्डी आदि पाण्डव- पक्ष के वीर कौरव-सैनिकों को अपने बाणों का निशाना बनाने लगे।
कौरव और पाण्डव-सेना का वह युद्ध, देवासुर-संग्राम के समान जान पड़ता था। आकाश में खड़े होकर देखने वाले देवताओं को वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्म ने दस दिनों तक युद्ध करके पाण्डवों की अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया।
कौरव और पाण्डव-सेना का वह युद्ध, देवासुर-संग्राम के समान जान पड़ता था। आकाश में खड़े होकर देखने वाले देवताओं को वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्म ने दस दिनों तक युद्ध करके पाण्डवों की अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया।
भीष्म द्रोण वध
दसवें दिन अर्जुन ने वीरवर भीष्म पर बाणों की
बड़ी भारी वृष्टि की। इधर द्रुपद की प्रेरणा से शिखण्डी ने भी पानी बरसाने वाले मेघ की भाँति
भीष्म पर बाणों की झड़ी लगा दी। दोनों ओर के हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल एक-दूसरे के बाणों से मारे गये। भीष्म की मृत्यु उनकी इच्छा के
अधीन थी। जब पांडवों को ये समझ में आ गया की भीष्म के रहते वो इस युद्ध को नहीं
जीत सकते तो श्रीकृष्ण के सुझाव पर उन्होंने भीष्म पितामह से ही उनकी मृत्यु का
उपाय पूछा. उन्होंने कहा कि जब तक मेरे हाथ में शस्त्र है तब तक महादेव के
अतिरिक्त मुझे कोई नहीं हरा सकता. उन्होंने ने ही पांडवों को सुझाव दिया कि शिखंmडी को सामने
करके युद्ध लड़े. वो जानते थे कि शिखंडी पूर्व जन्म में अम्बा थी इसलिए वो उसे
कन्या ही मानते थे। १०वे दिन के युद्ध में अर्जुन ने शिखंडी को आगे अपने रथ पर
बिठाया. शिखंडी को आगे देख कर भीष्म ने अपना धनुष त्याग दिया. उनके शस्त्र त्यागने
के बाद अर्जुन ने उन्हें बाणो कि शय्या पर सुला दिया। वे उत्तरायण की प्रतीक्षा
में भगवान विष्णु का ध्यान और स्तवन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। भीष्म के
बाण-शय्या पर गिर जाने के बाद जब दुर्योधन शोक से व्याकुल हो उठा, तब आचार्य द्रोण ने सेनापतित्व का भार ग्रहण किया। उधर हर्ष मनाती हुई
पाण्डवों की सेना में धृष्टद्युम्न सेनापति हुए। उन दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध
हुआ, जो यमलोक की आबादी को बढ़ाने वाला था। विराट और द्रुपद आदि राजा द्रोणरूपी
समुद्र में डूब गये। उस समय द्रोण काल के समान जान पड़ते थे। इतने ही में उनके
कानों में यह आवाज आयी कि 'अश्वत्थामा मारा गया'। इतना सुनते ही आचार्य द्रोण ने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिये। ऐसे समय में धृष्टद्युम्न के बाणों से आहत
होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े
कर्ण, शल्य और दुर्योधन वध
कर्ण और अर्जुन का एक दूसरे पर पर लक्ष्य करना
द्रोण बड़े ही दुर्धर्ष थे। वे सम्पूर्ण क्षत्रियों का
विनाश करके पाँच वें दिन मारे गये। दुर्योधन पुन: शोक से आतुर हो उठा। उस समय कर्ण
उसकी सेना का कर्णधार हुआ। पाण्डव-सेना का आधिपत्य अर्जुन को मिला। कर्ण और अर्जुन
में भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्रों की मार-काट से युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्राम को भी मात करने वाला था।
कर्ण और अर्जुन के संग्राम में कर्ण ने अपने बाणों से शत्रु-पक्ष के बहुत-से वीरों
का संहार कर डाला; यद्यपि
युद्ध गतिरोधपूर्ण हो रहा था लेकिन कर्ण तब उलझ गया जब उसके रथ का एक पहिया धरती
में धँस गया (धरती माता के श्राप के कारण)। वह अपने को दैवीय अस्त्रों के प्रयोग
में भी असमर्थ पाता है, जैसा की
उसके गुरु परशुराम का श्राप था। तब कर्ण अपने रथ के पहिए को निकालने के लिए नीचे
उतरता है और अर्जुन से निवेदन करता है की वह युद्ध के नियमों का पालन करते हुए कुछ
देर के लिए उसपर बाण चलाना बंद कर दे। तब श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि कर्ण को कोई अधिकार नहीं है की वह अब
युद्ध नियमों और धर्म की बात करे, जबकि स्वयं
उसने भी अभिमन्यु वध के समय किसी भी युद्ध नियम और धर्म का पालन नहीं किया था।
उन्होंने आगे कहा कि तब उसका धर्म कहाँ गया था जब उसने दिव्य-जन्मा द्रौपदी को
पूरी कुरु राजसभा के समक्ष वैश्या कहा था। द्युत-क्रीड़ा भवन में उसका धर्म कहाँ
गया था। इसलिए अब उसे कोई अधिकार नहीं की वह किसी धर्म या युद्ध नियम की बात करे
और उन्होंने अर्जुन से कहा कि अभी कर्ण असहाय है (ब्राह्मण का श्राप फलीभूत हुआ)
इसलिए वह उसका वध करे। श्रीकृष्ण कहते हैं की यदि अर्जुन ने इस निर्णायक मोड़ पर
अभी कर्ण को नहीं मारा तो संभवतः पांडव उसे कभी भी नहीं मार सकेंगे और यह युद्ध
कभी भी नहीं जीता जा सकेगा। तब, अर्जुन ने
एक दैवीय अस्त्र का उपयोग करते हुए कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। कर्ण के शरीर
के भूमि पर गिरने के बाद एक ज्योति कर्ण के शरीर से निकली और सूर्य में समाहित हो
गई।। तदनन्तर राजा शल्य कौरव-सेना के सेनापति हुए, किंतु वे युद्ध में आधे दिन तक ही टिक सके। दोपहर होते-होते
राजा युधिष्ठिर ने उन्हें मार दिया।
दुर्योधन वध और महाभारत युद्ध की समाप्ति
भीमसेन द्वारा दुर्योधन का वध
गिराया। दुर्योधन की प्राय: सारी सेना युद्ध में मारी गयी
थी। अन्ततोगत्वा उसका भीमसेन के साथ युद्ध हुआ। उसने पाण्डव-पक्ष के पैदल आदि
बहुत-से सैनिकों का वध करके भीमसेन पर धावा किया। उस समय गदा से प्रहार करते हुए
दुर्योधन के अन्य छोटे भाई भी भीमसेन के ही हाथ से मारे गये थे। महाभारत-संग्राम
के उस अठारहवें दिन रात्रिकाल में महाबली अश्वत्थामा ने पाण्डवों की सोयी हुई एक अक्षौहिणी सेना को सदा के लिये सुला दिया। उसने
द्रौपदी के पाँचों पुत्रों, उसके
पांचालदेशीय बन्धुओं तथा धृष्टद्युम्न को भी जीवित नहीं छोड़ा। द्रौपदी पुत्रहीन
होकर रोने-बिलखने लगी। तब अर्जुन ने सींक के अस्त्र से अश्वत्थामा को परास्त करके
उसके मस्तक की मणि निकाल ली। (उसे मारा जाता देख द्रौपदी ने ही अनुनय-विनय करके
उसके प्राण बचाये)। अश्वत्थामा इतने पर भी दुष्ट अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ को
नष्ट करने के लिये उस पर अस्त्र का प्रयोग किया। वह गर्भ उसके अस्त्र से प्राय:
दग्ध हो गया था; किंतु भगवान
श्रीकृष्ण ने उसको पुन: जीवन-दान दिया। उत्तरा का वही गर्भस्थ शिशु आगे चलकर राजा
परीक्षित् के नाम से विख्यात हुआ। कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा ये तीन कौरवपक्षीय वीर उस संग्राम से जीवित बचे। दूसरी ओर पाँच पाण्डव,सात्यकि तथा
भगवान श्रीकृष्णयेसात ही जीवित रह सके; दूसरे कोई
नहीं बचे। उस समय सब ओर अनाथा स्त्रियों का आर्तनाद व्याप्त हो रहा था। भीमसेन आदि भाइयों के साथ जाकर युधिष्ठिर ने
उन्हें सान्त्वना दी तथा रणभूमि में मारे गये सभी वीरों का दाह-संस्कार करके उनके
लिये जलांजलि दे धन आदि का दान किया। तत्पश्चात कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर आसीन
शान्तनुनन्दन भीष्म के पास जाकर युधिष्ठिर ने उनसे समस्त शान्तिदायक धर्म, राजधर्म (आपद्धर्म), मोक्ष धर्म तथा दानधर्म की बातें सुनीं। फिर
वे राजसिंहासन पर आसीन हुए। इसके बाद उन शत्रुमर्दन राजा ने अश्वमेध-यज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को बहुत
धन दान किया। तदनन्तर द्वारका से लौटे हुए अर्जुन के मुख से मूसलकाण्ड के कारण प्राप्त हुए शाप से पारस्परिक
युद्ध द्वारा यादवों के संहार का समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने परीक्षित् को राजासन
पर बिठाया और स्वयं भाइयों के साथ महाप्रस्थान कर स्वर्गलोक को चले गये।
यदुकुल का संहार और पाण्डवों का स्वर्गगमन
पाण्डवों का स्वर्गगमन
जब युधिष्ठिर राजसिंहासन पर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ-आश्रम से
वानप्रस्थ-आश्रम में प्रविष्ट हो वन में चले गये। (अथवा ऋषियों के एक आश्रम से
दूसरे आश्रमों में होते हुए वे वन को गये।) उनके साथ देवी गान्धारी और पृथा (कुन्ती) भी थीं। विदुर जी दावानल से दग्ध हो
स्वर्ग सिधारे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने पृथ्वी का भार उतारा और धर्म की स्थापना
तथा अधर्म का नाश करने के लिये पाण्डवों को निमित्त बनाकर दानव-दैत्य आदि का संहार
किया। तत्पश्चात भूमिका भार बढ़ाने वाले यादवकुल का भी ब्राह्मणों के शाप के बहाने
मूसल के द्वारा संहार कर डाला। अनिरूद्ध के पुत्र वज्र को राजा के पद पर अभिषिक्त
किया। तदनन्तर देवताओं के अनुरोध से प्रभासक्षेत्र में श्रीहरि स्वयं ही स्थूल
शरीर की लीला का संवरण करके अपने धाम को पधारे वे इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक में
स्वर्गवासी देवताओं द्वारा पूजित होते हैं। बलभद्र जी शेषनाग के स्वरूप थे, अत:
उन्होंने पातालरूपी स्वर्ग का आश्रय लिया। अविनाशी भगवान श्रीहरि ध्यानी पुरुषों
के ध्येय हैं। उनके अन्तर्धान हो जाने पर समुद्र ने उनके निजी निवासस्थान को छोड़
कर शेष द्वारकापुरी को अपने जल में डुबा दिया। अर्जुन ने मरे हुए यादवों का
दाह-संस्कार करके उनके लिये जलांजलि दी और धन आदि का दान किया। भगवान श्रीकृष्ण की
रानियों को, जो पहले
अप्सराएँ थीं और अष्टावक्र के शाप से मानवीरूप में प्रकट हुई थीं, लेकर हस्तिनापुर को चले। मार्ग में डंडे लिये हुए ग्वालों ने अर्जुन का तिरस्कार करके उन सबको
छीन लिया। यह भी अष्टावक्र के शाप से ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुन के मन में बड़ा शोक हुआ। फिर महर्षि व्यास के सान्त्वना देने पर उन्हें यह निश्चय हुआ कि 'भगवान् श्रीकृष्ण के समीप रहने से ही मुझमें बल था।' हस्तिनापुर में आकर उन्होंने भाइयों सहित
राजा युधिष्ठिर से, जो उस समय
प्रजावर्ग का पालन करते थे, यह सब
समाचार निवेदन किया। वे बोले-
'भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है और वे ही घोड़े हैं, किंतु भगवान श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ उसी
प्रकार नष्ट हो गया, जैसे
अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान।' यह सुनकर
धर्मराज युधिष्ठिर ने राज्य पर परीक्षित् को स्थापित कर दिया
इसके बाद बुद्धिमान् राजा संसार की अनित्यता का विचार करके
द्रौपदी तथा भाइयों को साथ ले हिमालय की तरफ महाप्रस्थान के पथ पर अग्रसर हुए। उस
महापथ में क्रमश: द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और
भीमसेन एक-एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथ पर आरूढ़ हो (दिव्य रूप धारी) भाइयों सहित स्वर्ग को
चले गये। वहाँ उन्होंने दुर्योधन आदि सभी धृतराष्ट्रपुत्रों को देखा। तदनन्तर (उन
पर कृपा करने के लिये अपने धाम से पधारे हुए) भगवान वासुदेव का भी दर्शन किया इससे
उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुईं यह मैंने तुम्हें महाभारत का प्रसंग सुनाया है। जो
इसका पाठ करेगा, वह
स्वर्गलोक में सम्मानित होगा।

हर कोई हिंदू धर्म के महाकाव्य महाभारत के बारे में जानता है। यह एक ऐसा शास्त्र है जिसके बारे में सबसे ज्यादा चर्चा और बातें की जाती है और इस काव्य में कई रहस्य है जिनके बारे में आजतक सही-सही पता नहीं लग पाया है या फिर बहुत कम लोगों को ही पता है। उदाहरण के लिए - हर कोई जानता है कि पांच पांडव थे और उनकी एक ही महारानी थी जिसका नाम द्रौपदी था, लेकिन क्या आपको पता है कि सभी पांडवों की एक-एक पत्नी और थी। ऐसे ही और कई भी बातें महाभारत में वर्णित है जिनके बारे में गिने-चुने और जानकर लोगों को ही पता है। इस आर्टिकल में महाभारत के ऐसे ही कुछ रहस्यों के बारे में बताया जा रहा है। महाकाव्य महाभारत से कुछ और रहस्यमयी बातें : भीम पहले पांडव थे जिनकी शादी सबसे पहले हुई थी: भीम का विवाह एक राक्षस हिडिम्ब की बहन हिडिम्बा के साथ हुआ था। हिडिम्ब का वध कर देने के कारण, हिडिम्बा को उसके रक्षक के रूप में भीम से विवाह करना अनिवार्य था। इन दोनों की एक संतान भी हुई थी जिसका नाम घटोत्कच था। घटोत्कच का वध, महाभारत के युद्ध में हो गया था। द्रोपदी की इच्छा : द्रोपदी पूर्व जन्म में शादी न होने के कारण परेशान थी और उन्होने भगवान शिव की आराधना की थी। इससे भगवान शिव प्रसन्न हो गए थे और उन्होने द्रोपदी से वरदान मांगने को कहा, तो द्रोपदी ने पांच बार में अपनी मांग पूरी की और भगवान ने तथास्तु कह दिया। बाद में वही पांच वरदान पांडवों के रूप में पूरे हो गए, लेकिन राजा ध्रुपद काफी परेशान थे कि ऐसा कैसे हो सकता है तो भगवान बाल्मिीकि ने आकर उनको समझाया कि यह द्रोपदी के पूर्व जन्म का मांगा हुआ वरदान है। क्या भगवान का अस्तित्व है? एक अंतिम सवाल पहली पसंद अर्जुन : जब द्रोपदी का स्वयंवर होने वाला था, तो राजा ध्रुपद अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे और इसीलिए उन्होने रणनीति के तहत मछली की आंख भेदने वाली प्रतियोगिता रखी थी। बाद में कर्ण के आने से स्वंयवर में थोड़ी खींचतान हो गई, लेकिन बाद में अर्जुन ने ही प्रतियोगिता जीत ली। हालांकि, बाकी के राजाओं ने बाद में लड़ाई छेड़ दी थी, पर भगवान कृष्ण के बीच में हस्तक्षेप करने पर स्थिति नियंत्रण में आ गई। द्रोपदी के स्वयंवर में भगवान और यमराज भी आएं थे। ऐसे कई अन्य रहस्य भी है जो महाकाव्य महाभारत से जुड़े हुए है।
महाभारत में अनेक ऐसे तथ्य है






महाभारत में व्यास भी एक पात्र के रूप में दिखाई देते हैं कृपया उनके बारे में उल्लेख दें|
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ReplyDeletelalit apne durlabh jaanakaare uplabhdha karai he
ReplyDeleteVery good information.
ReplyDeleteमहाभारत को नीति और राजनीति के दृष्टिकोण से विद्वानों ने पांचवां वेद माना है। महाभारत आदि पर्व में कहा गया है-
ReplyDeleteधर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत क्वचित।।
हे भरत श्रेष्ठ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संबंध में जो बात इस ग्रंथ में है, वही अन्यत्र भी है, जो इसमें नही है, वह कहीं भी नही है। भारतीय परंपरा के अनुसार इतिहास की परिभाषा है-
धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेश समन्वितम।
पूर्ववृत्त कथा युक्त मिह्हिासं प्रचक्षते।।
अर्थात जिसमें पूर्ववृत्त प्राचीनकाल में घटित घटनाओं का वर्णन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश सहित कथन किया गया हो, उसे इतिहास कहते हैं।
Good effort Lalit ! Keep it up
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